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इस कहानी को क्या नाम दें !

Posted On: 30 Aug, 2013 मस्ती मालगाड़ी में

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जब कभी कहानी लिखी जाती है तो उसका नाम भी तब ही तय हो जाता है पर कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जिनको नाम दे पाना थोड़ा मुश्किल होता है. फिल्म ‘सत्याग्रह’ की कहानी भी कुछ ऐसी है जिसे देखने के बाद दर्शकों के लिए यह समझ पाना थोड़ा कठिन है कि आखिरकार वो इस फिल्म की कहानी को क्या कहें.


हिन्दी सिनेमा के मशहूर निर्देशक प्रकाश झा ने दर्शकों को फिल्म ‘सत्याग्रह’ से पहले गंगाजल, अपहरण और राजनीति जैसी इंस्पायरिंग फिल्में दी हैं जिस कारण दर्शकों को फिल्म ‘सत्याग्रह’ से खास उम्मीदें थीं पर लगता है कि वो उम्मीदें पूरी तरह फेल तो नहीं पर पास भी नहीं हो पाई हैं.


सत्याग्रह फिल्म रिव्यू

निर्देशक: प्रकाश झा
कलाकार: अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, करीना कपूर खान, अमृता राव, अर्जुन रामपाल
अवधि: 152 मिनट

रेटिंग: 2 1/2


अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी और अजय देवगन जैसे कलाकारों के अभिनय पर सवाल खड़े करना हिन्दी सिनेमा को चुनौती देने जैसा है. फिल्म ‘सत्याग्रह’ में अमिताभ बच्चन, अजय देवगन और मनोज वाजपेयी का अभिनय काफी जोरदार रहा है पर तीन ही कलाकारों के भरोसे पूरा सत्याग्रह नहीं छोड़ा जा सकता था. ‘सत्याग्रह’ फिल्म की कहानी गांधी के अंतिम दिनों, इंजीनियर सत्येंद्र दुबे के मर्डर, जनलोकपाल बिल, अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी और अन्ना हजारे से जुड़ी हुई है. प्रकाश झा ने एक फिल्म की कहानी में वास्तविक जीवन से जुड़ी हुई बहुत सी कहानियों को शामिल कर लिया जिस कारण दर्शकों को कहानी थोड़ी अटपटी लगी.


फिल्म सत्याग्रह में रिटायर्ड टीचर द्वारका आनंद (अमिताभ बच्चन) अपने सिद्धांतों पर चलने वाले ऐसे इंसान हैं, जो देश में भ्रष्टाचार जड़ से मिटा देना चाहते हैं और दूसरी तरफ दिल्ली में टेलिकॉम कंपनी चला रहे बिजनेस टायकून मानव राघवेंद्र (अजय देवगन) का सपना अपने बिजनेस को आकाश की ऊंचाइयों तक ले जाने का होता है. इसी बीच राजनीति को बिजनेस समझने वाला प्रदेश का मिनिस्टर बलराम सिंह (मनोज बाजपेयी) किसी भी तरह सत्ता तक पहुंचना चाहता है. यास्मीन (करीना कपूर) एक सच्चे पत्रकार की भूमिका निभा रही है जो हर खबर की तह तक पहुंचकर सच को दर्शकों के सामने लाना चाहती है और राजवंशी सिंह (अर्जुन रामपाल) राजनीति में अपना मुकाम बनाने के लिए सड़कों पर राजनीति करता है.


सभी अपनी-अपनी जिंदगी को उसी तरीके से चला रहे होते हैं जैसा वो चलाना चाहते हैं. इन सभी की जिंदगी में बदलाव तब होता है जब द्वारका आनंद के इंजीनियर बेटे अखिलेश की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. अखिलेश जिले में बन रहे एक फ्लाइओवर के प्रॉजेक्ट का हेड इंजीनियर होता है और फ्लाईओवर के निर्माण में चल रहे घपलों को उजागर करना चाहता है.  अखिलेश की मौत के बाद मंत्री बलराम सिंह की तरफ से परिवार को 25 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया जाता है.


अखिलेश की मौत के कई महीनों बाद भी जब पत्नी (अमृता सिंह) को मुआवजा नहीं मिलता, तो वह कलेक्टर ऑफिस में जाती है. अखिलेश की पत्नी और पिता को पैसा ना मिलने का कारण भ्रष्टाचार होता है. यहां से शुरुआत होती है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने की जिसमें धीरे-धीरे मीडिया भी शामिल होने लगती है.


निर्देशन में कमी नहीं पर कहानी कुछ दमदार नहीं

प्रकाश झा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सत्याग्रह’ को देखने के बाद उनकी तारीफ करनी होगी कि उन्होंने हजारों लोगों की भीड़ वाले कई सीन जोरदार ढंग से फिल्माएं हैं पर कुछ जगह ऐसी थी जहां फिल्म की कहानी कमजोर नजर आई. अमिताभ बच्चन और मनोज वाजपेयी का अभिनय काफी जोरदार है जो फिल्म की कहानी को दमदार बना देता है.


क्यों देखें: यदि प्रकाश झा के निर्देशन में बनी फिल्में पसंद हैं तो.

क्यों ना देखें: कई कहानियों के यदि एक ही फिल्म में दिखाए जाने से नफरत है तो.



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